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तुम

तुम ही से लड़ जाता हूँ  तुम से ही दिल लगाता   हूँ  तुम को ही भूलता हूँ  फिर खुद को भूल जाता हूँ  है दीवार के पार भी कोई  ये उम्मीद लगाता हूँ  शाम आने पे अंधेरो मे  चुपचाप खो जाता हूँ मैं