रज्जन भईया बड़ी तेजी से साईकिल से उतरे और दौड़ लगा दिये साथ मे चिल्लाते जा रहे थे "अरे लल्लन कहां हो बे,तुम्हारा हाईस्कूल का रिजल्ट आ गया " लल्लन यानी लाल बिहारी शुकुल , बिचारे सुने तो पर मारे डर के अपनी खटिया मे सर छुपा लिन्ने। अब इसमें बिचारे लल्लन का कौनो दोष नही। पिछले चार साल से लगातार फेल हो रहे। पिछले दफा तो 100-100 रूपिया भी धरा कापी मे पर ढाक के वही तीन पात्र, फिर फेल। अबकी टिल्लू चाचा कहि दीनी कि अबकी लास्ट है। जौ लल्लन अबकी बेरा हाईस्कूल न करि पाये तो गोरखपुर का टिकट कटा दीवा जाये करै जाके बड़े भईया के साथ ठेकेदारी। अब लल्लन को दुख इस बात का नहीं था कि गोरखपुर जाना परी, दुख तो इस बात का था कि पिन्की से रिस्ता टूट जायि। पिन्की वही न , दालमण्डी वाले फूफा के किरायेदार। अब लल्लन की महतारी और बुआ की बहौत पटै सो बुआ ने पिन्की जो कि उनके यहाँ किरायेदार पड़ियाईन की तीसरे नम्बर की लड़की थी। पाड़े जी वही फूफा के यहां मुनीम थे और पड़ियाईन बुआ को सगी भाभी से भी ज्यादा मानती थी। अब लल्लन बचपने से पिन्की के साथ खेलते रहे तो मौका पाकर पड़ियाईन ने पिन्की और लल्लन की बात चलायी ...
आओ थोड़ी चर्चा कर लें, बात पुरानी चली गयी जो, घाव है लेकिन हरा है अब तक, कब तक ऐसे चलेगा यूंही, आखों के कोनों में कब तक, नमी का साया बना रहेगा, इस पर भी कुछ चर्चा करलें , आओ थोड़ी चर्चा कर ले, अन्तर मन में चलता है जो, हरदम क्यों दुख रिसता है वो, पीर बहुत जो भरी हुयी है , तेरे अन्दर गुस्सा क्यों है, समय भी इस पर खर्चा कर लें, आओ थोड़ी चर्चा कर लें, मै मेरा और मुझको में है, क्योंं, सिमटी है दुनिया इस पर , तेरा ये है, मेरा वो है, अंतहीन जो दौड़ लगी है, तेरे गांधी , मेरे गांधी मे क्या अन्तर, इस पर भी एक पर्चा कर लें, आओ थोड़ी चर्चा कर लें,
काफी आज सुबह से बारिश हो रही है . वैसे तो बारिश का मौसम मन को हरा कर देता है किन्तु उत्तराखंड में हुई भारी जल प्रलय में हम सभी के कई परचित या तो काल के मुह में समां गए हैं या फिर अभी तक अपने करीबियों से मिल नहीं पाए है. रोज़ घर पहुँच कर तुरंत ही टीवी खोल कर न्यूज़ सुनता हूँ . कुछ लोगो (????) की धन लोलुपता ने जंगलो का सफाया कर दिया और पहाड़ो को कमजोर कर दिया . जिसका खमियाज आम जनता को भुगतना पद रहा है. ईश्वर से प्राथना करता हूँ की सभी की सहायता करिए साथ ही साथ सेवा कार्य मैं लगे हुए बन्दों का सुक्रिया अदा करता हूँ .
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