क्या बात है की अब छोर मिलते नहीं
तुम ही हो मेरे  कोई और मिलते नहीं
अजीब किस्‍से थे, सुलगती हुई रातों के
थिरकते हुए तन के,हसींं मुलाकतों के  





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